व्यापक है सेवा का दायरा

व्यापक है सेवा का दायरा

नारी में जहां प्रेम, करुणा, ममता और सहनशीलता का विपुल भंडार है, वहीं उसमें सेवा भाव और दृढ़ इच्छाशक्ति का लहराता सागर भी है। उसकी इस इच्छाशक्ति के आगे पहाड़ जैसी ऊंचाई भी बौनी नजर आने लगती है। कुछ करने का बीड़ा अगर वह उठा ले, तो उसे पूरा करके ही दम लेती है। ऐसी ही एक नारी हैं श्रीमती उषा राम।

उनके जीवन का एकमात्र ध्येय ही है समाज सेवा। स्लम के दबे-कुचले बच्चों का उत्थान करना, महिलाओं को साक्षर बना कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना, भटकते बेरोजगारों को उचित मार्गदर्शन दे कर उन्हें समाज की मु2य धारा में लाना, मंदबुद्धि और विकलांग बच्चों के विकास के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराना सहित उनके सेवा संबंधी कार्यों की एक लंबी श्रंखला है।

पंजाब में जन्मीं उषाजी की स्कूल से ले कर कॉलेज तक की पढ़ाई-लिखाई चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद आदि कई शहरों में हुई। वर्तमान में वे दिल्ली स्थित लक्ष्मण पब्लिक स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

अपनी नौकरी को मात्र जीने का जरिया तथा समाज सेवा को आत्मसंतुष्टि मानने वाली उषा का कहना है, ‘बच्चे चाहे अभिजात्य वर्ग के हों या स्लम के, सभी को शिक्षा पाने का अधिकार है। मैंने संपेरा बस्ती, नवजीवन कैंप, गोविंदपुरी कॉलोनी स्थित झुग्गी-झोपडिय़ों में रहने वाले लगभग ३०० बच्चों को अपनी संस्था के माध्यम से गोद लिया है। अपने इसी स्कूल में उनके लिए एक अलग से सेवा स्कूल चला रही हूं, जिसमें सबकुछ नि:शुल्क है। इस माहौल में आ कर उन बच्चों का समुचित विकास हो रहा है।’

उषा एक अन्य संस्था ‘नूतन अभिलाषा’ से भी जुड़ी हुई हैं, जो मंदबुद्धि बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और विकास के लिए प्रयत्नशील है। इन बच्चों के उचित विकास में उषा की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। अपने वेतन का एक बड़ा भाग वे इन बच्चों के लिए खर्च करती हैं। साथ ही अपना व्यक्तिगत वाहन भी वे इन बच्चों की सेवा में उपलब्ध कराती हैं। इसी संस्था के माध्यम से वे स्लम में रहने वाली महिलाओं की साक्षरता के लिए भी प्रयत्नशील हैं। साक्षरता के अलावा वे उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिलवा रही हैं। भटकते युवा बेरोजगारों को रोजगार दिलाने और उनको सही राह पर लाने के लिए भी वे सतत प्रयत्नशील हैं।

बात चाहे स्लम के बच्चों के विकास की हो, स्लम की महिलाओं के विकास की हो, साक्षरता की हो, प्रौढ़ शिक्षा की हो, पर्यावरण को बचाने की हो, जल-संरक्षण की हो या समाज सेवा के किसी भी कार्य की हो, उषा मानवता और भलाई के सभी कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। समाज सेवा के कार्यों के लिए उषा कई पुरस्कारों से स6मानित भी हो चुकी हैं।

समाज सेवा का उनका सपना शायद ही कभी पूरा हो पाता, यदि उन्हें अपने पति पी.एस. हरी राम का सहयोग और समर्थन नहीं मिलता। अपने स्कूल के प्रबंधन की भी वे तहेदिल से आभारी हैं, जो कदम-कदम पर उनकी योजनाओं को कार्य-रूप देने में कभी पीछे नहीं हटा।

‘खुद के लिए तो हर इनसान जीता है, दूसरों के लिए तो जी कर देखो।’ इस विचारधारा में विश्वास रखने वाली उषा के स्कूल एवं संस्था के द्वार उन सभी लोगों के लिए हमेशा ही खुले हैं, जो बेसहारा, अनपढ़, बेरोजगार, विकलांग या मंदबुद्धि हैं।

‘मेरी इच्छा विकलांग लोगों के लिए एक स्मॉल स्केल को-ऑपरेटिव बैंक खोलने की है। इसके लिए कोशिश जारी है। इस माध्यम से भी शायद मैं इनकी मदद कर सकूं, ताकि ये अपने कुछ सपने तो पूरे कर सकें।’ कहना है उषा का।

उम्र के लगभग पांच दशक पूरी कर चुकीं उषा जब स्लम की गलियों में जाती हैं, तो वहां के सभी जरूरतमंद उनकी तरफ हसरत भरी निगाहों से देखते हैं, सहयोग, स्नेह और आश्रय की आशा में। 1या पता वे उनके लिए कौन-सा उपहार ले कर आई हों! बच्चों की तो वे जैसे मां ही बन जाती हैं।

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