दूसरों के लिए समर्पित

दूसरों के लिए समर्पित

आज के लूट-खसोट के माहौल में जब यह पता चले कि कोई ऐसा शख्स भी है, जो अपने आप को भूल कर उन लोगों के उत्थान के लिए जी जान से लगा है, जिन्हें समाज ने बोझ समझ कर घुट-घुट कर जीने के लिए मजबूर कर दिया है, तो सहज ही उसके प्रति नतमस्तक होने को जी चाहता है। ऐसी ही एक शख्सीयत हैं ज्योत्सना चटर्जी।

कोलकाता में जन्मीं ज्योत्सना के पिताजी इलाहाबाद विश्वविालय में अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष थे। अत: उनकी पढ़ाई-लिखाई भी इलाहाबाद में ही हुई। सेंट मेरी कॉन्वेंट स्कूल से बारहवीं करने के बाद आगे की पढ़ाई उन्होंने इलाहाबाद विश्वविालय से की। एम.ए. (अंगरेजी) की अपने बैच की टॉपर ज्योत्सना को इसी आधार पर कोलकाता विश्वविालय में लेक्चरर की नौकरी मिल गई।

अपने पति और बच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहीं ज्योत्सना की जिंदगी में अचानक ही एक ऐसा मोड़ आया, जहां से उनकी जिंदगी का अर्थ ही बदल गया। घर-परिवार और नौकरी में सिमटी जिंदगी का दायरा विस्तृत हो कर समाज सेवा की ओर उन्मुख हो गया।
यह सारा बदलाव १९७८ में उनके पति के बेंगलूर तबादले का ही प्रतिफल था। तब ज्योत्सना ने भी दो साल की छुट्टी ले ली थी और पति के साथ ही बेंगलूर चली गई थीं। वहीं उनकी मुलाकात इंदिरा राव से हुई, जो उस समय गरीब बच्चों के लिए बालवाड़ी तथा कई अन्य कार्यों में व्यस्त थीं। इंदिरा राव के साथ ही मिल कर ज्योत्सना ने १९७९ में ‘मैत्री महिला संगठन’ नामक एक संस्था का गठन किया और फिर जुट गईं महिलाओं की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए। उन्होंने बलात्कार जैसे घिनौने कार्य से ले कर वेश्यावृति, दहेज, जातिवाद, महिलाओं की शिक्षा, महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा आदि विभिन्न मुद्दों पर आवाज उठाई तथा महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति सजग किया।

महिलाओं की आवाज बुलंद करने के उद्देश्य से बना यह संगठन धीरे-धीरे सभी वर्गों के पीडि़तों का सहारा बन गया। अत: बाद में इसका नाम बदल कर ‘बंगलोर मैत्री संघ’ रख दिया गया। समय के प्रवाह के साथ-साथ ज्योत्सना के कार्यों को लोकप्रियता मिलती गई और समाज सेवा की उनकी परिधि कर्नाटक की सीमा-रेखा को पार करती हुई मेघालय, आंध्र प्रदेश, असम, हरियाणा, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल व दिल्ली तक फैल गई।

ज्योत्सना महिलाओं के साथ-साथ बच्चों और पुरुषों के हित की बात भी करती हैं। वह कहती हैं, ‘मजदूरों का शोषण और वेश्यावृति या शादी के लिए लड़कियों की खरीद-बिक्री कानूनन अपराध हैं।’ हाल ही में संपन्न हुए एक विशेष एकवर्षीय कार्यक्रम (अप्रैल २०००-मार्च २००१) के तहत ज्योत्सना ने वेश्याओं के १०० से भी अधिक बच्चों को अपने संरक्षण में लिया, ताकि उन पर अपनी मां की जीवनशैली का असर न पड़े।

ज्योत्सना राजनीति में आने की बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं। वे कहती हैं, ‘अगर मैं राजनीति में आ गई, तो समाज सेवा का मेरा कार्य अधूरा रह जाएगा।’ हां, इस बात की वे जबरदस्त वकालत करती हैं कि महिलाएं राजनीति के प्रति जागरूक हों। इसी उद्देश्य से उन्होंने कर्नाटक के दो जिलों धारवार और कोलार स्थित अपनी संस्थाओं में औरतों को राजनीति की शिक्षा देने का कार्यक्रम शुरू किया है, जहां उन्हें चुनाव की सारी बातें बताई जाती हैं।

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